10 किमी दूर राजधानी, फिर भी सड़क से कोसों दूर मेहरकोट
200 मीटर सड़क के इंतजार में गुजर गई पीढ़ियां, पलायन से गांव में बचे महज 10–12 परिवार
देहरादून/सहसपुर। देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जब देश विकास और आत्मनिर्भरता की उपलब्धियों का जश्न मना रहा है, वहीं देहरादून की राजधानी से महज करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित मेहरकोट गांव आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहा है। गांव तक पहुंचने वाले करीब 200 मीटर के बेहद दुर्गम और खतरनाक हिस्से की सड़क वर्षों से अधूरी पड़ी है। सवाल यह है कि आखिर विकास की मुख्यधारा से मेहरकोट कब जुड़ेगा?
ग्रामीणों के मुताबिक गांव तक पहुंचने वाला रास्ता इतना कठिन है कि सामान्य वाहन से यहां पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। बरसात में हालात और बदतर हो जाते हैं। पहाड़ी से मलबा आने, भू-कटाव और पेड़ गिरने के कारण रास्ता कई बार पूरी तरह बाधित हो जाता है। ऐसे में ग्रामीणों को स्वयं श्रमदान कर रास्ते को किसी तरह आवागमन के लायक बनाना पड़ता है।
वन विभाग की अनुमति का पेंच, वर्षों से नहीं निकला समाधान
बताया जाता है कि सड़क निर्माण के रास्ते में वन विभाग के नियमों और अनुमति का पेंच अटका हुआ है। कुछ वर्ष पहले विधायक निधि से सड़क के एक हिस्से का निर्माण भी कराया गया था, लेकिन पूरी सड़क आज तक नहीं बन पाई। जो हिस्सा बनाया गया था, वह भी समय के साथ जर्जर हो चुका है।
ग्रामीणों का सवाल है कि जब केंद्र और राज्य में लंबे समय से एक ही सरकार है और सरकार अंतिम व्यक्ति तक विकास योजनाओं का लाभ पहुंचाने की बात करती है, तो मेहरकोट जैसे गांव के लिए महज 200 मीटर सड़क का समाधान वर्षों में क्यों नहीं निकल पाया?
बीमार को अस्पताल पहुंचाना चुनौती, बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित
सड़क नहीं होने का सबसे गंभीर असर आपातकालीन परिस्थितियों में दिखाई देता है। किसी ग्रामीण के बीमार पड़ने पर उसे अस्पताल तक पहुंचाना बेहद कठिन हो जाता है। एंबुलेंस जैसी सुविधा गांव तक पहुंचना भी चुनौतीपूर्ण है।
बच्चों को भी रोजाना दुर्गम रास्तों से पैदल स्कूल जाना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि रास्ते में कई बार गुलदार दिखाई देने के कारण बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी रहती है। गांव का एकमात्र सरकारी स्कूल भी दुर्गमता और अन्य परिस्थितियों के चलते वर्षों पहले बंद हो चुका है।
सड़क नहीं, इसलिए गांव भी नहीं बचा
मेहरकोट की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि सड़क और मूलभूत सुविधाओं के अभाव ने गांव की आबादी को लगातार कम कर दिया है। ग्रामीणों के अनुसार कभी आबाद रहने वाले इस गांव में अब मुश्किल से 10–12 परिवार ही रह गए हैं। अधिकांश लोग बेहतर सुविधाओं और बच्चों के भविष्य के लिए पोंधा तथा आसपास के क्षेत्रों में जाकर बस चुके हैं। इसी
पलायन का असर खेती पर भी पड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि खेती चौपट हो रही है और बेहतर जीवन की तलाश में कई परिवार अपनी जमीन तक बेचने को मजबूर हुए हैं।
आश्वासन बहुत मिले, सड़क आज भी अधूरी
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार जनप्रतिनिधि गांव पहुंचे, बैठकें हुईं और सड़क निर्माण को लेकर आश्वासन भी मिले, लेकिन स्थायी समाधान आज तक नहीं निकल पाया। दो दिन पहले भी लगातार बारिश से क्षतिग्रस्त रास्ते को ग्रामीणों ने खुद श्रमदान कर किसी तरह चलने लायक बनाया।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क के इंतजार में उनकी पीढ़ियां गुजर गईं। बचपन में सड़क बनने की उम्मीद रखने वाले लोग आज बुजुर्ग हो चुके हैं, लेकिन इंतजार अभी खत्म नहीं हुआ है।
विधायक के इस्तीफे वाले बयान के बाद उठ रहा सवाल
सहसपुर क्षेत्र में हाल ही में सड़क निर्माण को लेकर हुए विवाद के दौरान सहसपुर विधायक सहदेव सिंह पुंडीर द्वारा सड़क नहीं बनने की स्थिति में इस्तीफा देने की बात कहे जाने के बाद मेहरकोट के ग्रामीणों का सवाल भी सामने आया है।
ग्रामीण पूछ रहे हैं कि क्या मेहरकोट की सड़क के लिए भी कोई ऐसी ही प्रतिबद्धता और संकल्प दिखाई देगा?
यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से है जिसके सामने वर्षों से महज 200 मीटर सड़क का समाधान लंबित है।
सिस्टम के सामने ग्रामीणों की खुली चुनौती
ग्रामीणों की पीड़ा अब केवल सड़क निर्माण की मांग तक सीमित नहीं रह गई है। उनका कहना है कि यदि मेहरकोट की वास्तविक स्थिति को समझना है तो सिस्टम से जुड़े किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या जनप्रतिनिधि को अपनी कार से गांव तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए।
क्या राजधानी देहरादून से महज 10 किलोमीटर दूर होने के बावजूद मेहरकोट को सड़क जैसी मूलभूत सुविधा के लिए और कितने वर्षों तक इंतजार करना होगा?
देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ मना चुका है, लेकिन मेहरकोट के ग्रामीण आज भी उसी उम्मीद में हैं कि एक दिन उनके गांव तक भी पक्की सड़क पहुंचेगी और उनका गांव विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकेगा सड़क का सकल्प स्वर्गीय वरिष्ठ पत्रकार राजीव कुमार ने भी लिया था परंतु वह अचानक दिल का दौरा पडने से दुनिया से चले गए अधूरे सपने लिए ।
अब सवाल सिर्फ 200 मीटर सड़क का नहीं है। सवाल उन बचे हुए परिवारों के भविष्य का है, सवाल पलायन की मार झेल रहे एक गांव के अस्तित्व का है और सवाल उस व्यवस्था का है, जो विकास की बड़ी-बड़ी तस्वीरों के बीच राजधानी से कुछ ही किलोमीटर दूर बसे एक गांव की छोटी-सी सड़क की समस्या का समाधान अब तक नहीं कर पाई ।
सविता रानी
डायरेक्ट एंड चीफ एडिटर
