उत्तराखंड NEET UG MBBS फर्जी सर्टिफिकेट मामला, गृह सचिव से 770 अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्रों की जांच की मांग

नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट के अध्यक्ष कृष्णकांत ने गृह सचिव शैलेश बगोली को पत्र सौंपकर मामले में जल्द जांच कमेटी गठित करने की मांग की

देहरादून: उत्तराखंड में एमबीबीएस दाखिलों के लिए राज्य कोटे की सीटें हासिल करने में कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल का मामला सामने आया है. इन फर्जी दस्तावेजों के सहारे लगभग 770 ऐसे छात्रों ने आरक्षण का लाभ उठाया, जो उत्तराखंड के मूल निवासी नहीं हैं. जबकि, उनके स्कूल और कॉलेज तमिलनाडु, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे अन्य राज्यों से संबंधित पाए गए. इन 770 अभ्यर्थियों के मूल निवास प्रमाणपत्रों की जांच की मांग की गई है.

उत्तराखंड NEET UG MBBS फर्जी सर्टिफिकेट मामला: उत्तराखंड में एमबीबीएस दाखिलों के दौरान कथित फर्जी प्रमाणपत्रों और संदिग्ध मूल निवास प्रमाणपत्रों के आधार पर राज्य कोटे की एमबीबीएस सीटें हासिल करने के मामले में जांच का दायरा बढ़ाने की मांग की गई है. नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट के अध्यक्ष कृष्णकांत ने बुधवार को गृह सचिव शैलेश बगोली को पत्र सौंपकर इस मामले में जल्द जांच कमेटी गठित करने की मांग की.

770 अभ्यर्थियों के मूल निवास पर संदेह, गृह सचिव को सौंपा पत्र: ट्रस्ट का दावा है कि उसके पास करीब 770 ऐसे अभ्यर्थियों का डेटा है, जिनके उत्तराखंड के मूल निवासी होने को लेकर संदेह है. ट्रस्ट ने इन सभी अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों की जांच करने के साथ ही दाखिला प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की भी पड़ताल करने की मांग की है. मामला राज्य में मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता और राज्य कोटे की सीटों के लिए निर्धारित पात्रता शर्तों से जुड़ा है.

24 प्रमाणपत्रों की जांच में 18 फर्जी होने का दावा, दूसरे राज्यों में पढ़ाई करने वाले अभ्यर्थी भी जांच के दायरे में: ट्रस्ट के अध्यक्ष के मुताबिक-

एमबीबीएस प्रवेश प्रक्रिया में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित श्रेणी के तहत दाखिले के लिए इस्तेमाल किए गए प्रमाणपत्रों की जांच के दौरान करीब 24 अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की पड़ताल की गई थी. इनमें से 18 अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए. साथ ही, इन प्रमाणपत्रों से जुड़ी जानकारी सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध नहीं होने की बात भी सामने आई. इसी आधार पर ट्रस्ट ने दूसरे अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जानकारी जुटानी शुरू की. इसके बाद करीब 770 अभ्यर्थियों की सूची तैयार की गई, जिनके मूल निवास या अन्य संबंधित प्रमाणपत्रों की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं.
-कृष्णकांत, अध्यक्ष, नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट-

ट्रस्ट के अध्यक्ष का कहना है कि हालांकि, इन सभी अभ्यर्थियों के दस्तावेज फर्जी हैं या उन्होंने नियमों का उल्लंघन किया है, इसकी पुष्टि आधिकारिक जांच के बाद ही हो सकेगी.

शैक्षणिक रिकॉर्ड, मूल निवास प्रमाणपत्र और जमा दस्तावेजों के मिलान की मांग: ट्रस्ट के अनुसार, संदिग्ध सूची में ऐसे अभ्यर्थी भी शामिल हैं, जिन्होंने उत्तराखंड का मूल निवास प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर राज्य कोटे के तहत एमबीबीएस की सीट हासिल की. इनमें कुछ अभ्यर्थियों की दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई दूसरे राज्यों में हुई है, जबकि कुछ के शैक्षणिक रिकॉर्ड विदेश से जुड़े होने का दावा किया गया है. ट्रस्ट का कहना है कि-

इन अभ्यर्थियों के शैक्षणिक रिकॉर्ड, मूल निवास प्रमाणपत्र और प्रवेश के दौरान जमा किए गए अन्य दस्तावेजों का आपस में मिलान किया जाना चाहिए. साथ ही, यह भी जांच होनी चाहिए कि प्रमाणपत्र जारी करने के दौरान निर्धारित नियमों का पालन किया गया था या नहीं. दूसरे राज्य से पढ़ाई करना अपने आप में किसी प्रमाणपत्र के फर्जी होने का प्रमाण नहीं है. ऐसे में प्रत्येक अभ्यर्थी की पात्रता और दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति की जांच जरूरी होगी.

-कृष्णकांत, अध्यक्ष, नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट-

हाईकोर्ट के आदेश के बाद चार सप्ताह में कमेटी गठन की मांग: ट्रस्ट के अध्यक्ष के मुताबिक, इस मामले में दायर जनहित याचिका पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर को राज्य सरकार को निर्देश दिए थे. उनके अनुसार, आदेश प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर गृह सचिव और संबंधित सचिव को कमेटी गठित करनी है. इस कमेटी को करीब 770 संदिग्ध अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच करनी होगी. इसके अलावा, यदि जांच के दौरान किसी सरकारी अधिकारी की भूमिका सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय करने की मांग की गई है.

जांच के बाद जिम्मेदारी तय करने की मांग: ट्रस्ट के अनुसार, जांच छह महीने के भीतर पूरी कर रिपोर्ट सरकार को सौंपने और उसके बाद नियमानुसार उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं. इसी समय सीमा को ध्यान में रखते हुए ट्रस्ट ने शासन से जल्द कमेटी गठित कर जांच शुरू कराने की मांग की है. ट्रस्ट चाहता है कि जांच केवल अभ्यर्थियों के दस्तावेजों तक सीमित न रहे, बल्कि पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी भी तय की जाए.

पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग: इसके तहत विश्वविद्यालय के संबंधित अधिकारियों, रजिस्ट्रार, परीक्षा और प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े जिम्मेदार कर्मचारियों के साथ एसडीएम, जिलाधिकारियों और अन्य संबंधित सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जांच करने की मांग की गई है. जांच में यह पता लगाने पर जोर दिया गया है कि कहीं प्रमाणपत्र जारी करने, उनका सत्यापन करने या दाखिले के दौरान दस्तावेजों को मंजूरी देने में कोई अनियमितता तो नहीं हुई. यदि किसी अधिकारी की संलिप्तता सामने आती है, तो उसके पद और जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए.

जांच कमेटी और कार्रवाई पर नजर: इस मामले में भविष्य के लिए भी व्यवस्था बनाने की मांग की जा रही है. ट्रस्ट के अध्यक्ष के अनुसार, हाईकोर्ट ने ऐसे मामलों की जांच के लिए स्थायी कमेटी बनाने पर विचार करने को कहा है. इसका उद्देश्य प्रवेश और अन्य प्रक्रियाओं में आरक्षित श्रेणियों या विशेष पात्रता के आधार पर लाभ लेने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले प्रमाणपत्रों का समय-समय पर सत्यापन करना है. इससे संदिग्ध दस्तावेजों की समय रहते पहचान करने और पात्र अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा करने में मदद मिल सकती है. फिलहाल, ट्रस्ट ने गृह सचिव को पत्र सौंपकर कमेटी का जल्द गठन करने और तय समयसीमा के भीतर जांच शुरू कराने की मांग की है. अब मामले में शासन स्तर पर होने वाली कार्रवाई और जांच कमेटी के गठन पर नजर रहेगी.